मामला उस समय शुरू हुआ जब महिला ने अपने अनलिस्टेड शेयर बेचकर करीब ₹8.31 करोड़ का Long-Term Capital Gain घोषित किया। इसके बाद उन्होंने मुंबई के Juhu Tara Road स्थित एक आवासीय संपत्ति में करीब ₹7.50 करोड़ का निवेश किया और Income Tax Act की Section 54F के तहत छूट का दावा किया।
लेकिन इस लेनदेन में एक बात आयकर विभाग के ध्यान में आई—जिस संपत्ति को महिला ने खरीदा था, वह उनके पति की थी और लेनदेन उनके पति के sole proprietorship HP Trading के माध्यम से हुआ था।
आयकर विभाग ने क्यों उठाए सवाल?
Assessing Officer ने इस लेनदेन को सामान्य खरीद-बिक्री मानने के बजाय इसे टैक्स देनदारी कम करने के लिए किए गए कथित “colourable device” के रूप में देखा।
विभाग के आकलन के अनुसार, पति को इस संपत्ति की बिक्री से करीब ₹4.85 करोड़ का Short-Term Capital Gain हुआ था। बाद में पति ने करीब ₹3.56 करोड़ की राशि को अपने कारोबारी नुकसान के खिलाफ सेट ऑफ किया।
इसी आधार पर विभाग ने पति-पत्नी के बीच हुए दोनों लेनदेन को आपस में जुड़ा हुआ माना और महिला की Section 54F की करीब ₹6.92 करोड़ की छूट को अस्वीकार कर दिया। यह आकलन 30 दिसंबर 2022 को Section 143(3) read with Section 144B के तहत पूरा किया गया था।
महिला ने क्या सफाई दी?
महिला की ओर से कहा गया कि संपत्ति खरीदने का उद्देश्य निवेश और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा था। उनका कहना था कि संपत्ति को भविष्य में किराए पर भी दिया जा सकता था।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह उस संपत्ति में रहने के लिए नहीं गई थीं और अपने पति के पैतृक घर में ही रह रही थीं।
मामले में संपत्ति का दस्तावेजी हस्तांतरण, भुगतान और अन्य संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर मौजूद थे। ITAT के आदेश में यह भी सामने आया कि संपत्ति की खरीद के लिए भुगतान को लेकर दस्तावेजी रिकॉर्ड उपलब्ध था।
ITAT के सामने सबसे अहम सवाल क्या था?
Tribunal के सामने मूल सवाल यह था कि क्या केवल इस आधार पर Section 54F की छूट से इनकार किया जा सकता है कि नई आवासीय संपत्ति पति से खरीदी गई थी।
ITAT ने मामले के रिकॉर्ड और पहले के न्यायिक फैसलों पर विचार किया। Tribunal के आदेश में ऐसे पूर्व मामलों का भी उल्लेख किया गया, जिनमें परिवार के सदस्य या पति-पत्नी के बीच वास्तविक लेनदेन के बाद Section 54/54F की छूट को स्वीकार किया गया था।
लेनदेन की टाइमलाइन बनी अहम कड़ी
आयकर विभाग के तर्क में पति के कारोबारी नुकसान और बाद में उसके खिलाफ capital gain के adjustment को भी महत्वपूर्ण माना गया था।
लेकिन Tribunal ने लेनदेन की टाइमलाइन पर गौर किया। संपत्ति का ट्रांसफर जून 2021 में हुआ था, जबकि पति के जिस कारोबारी नुकसान को विभाग ने अपने तर्क का आधार बनाया, वह बाद की अवधि में सामने आया।
इसलिए ITAT ने विभाग के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दोनों घटनाओं को पहले से बनाई गई एक ही योजना का हिस्सा माना जा सकता है।
Section 54F क्या है?
Section 54F, Income Tax Act, 1961 के तहत कुछ परिस्थितियों में किसी आवासीय मकान के अलावा अन्य Long-Term Capital Asset के ट्रांसफर से हुए Long-Term Capital Gain पर नई आवासीय संपत्ति में निर्धारित तरीके से निवेश करने पर छूट का प्रावधान है।
आयकर विभाग के मौजूदा ITR दस्तावेजों में भी Section 54F के तहत नई residential house की खरीद/निर्माण और निवेश की तारीख से संबंधित विवरण मांगे जाते हैं।
इस मामले में विवाद यह नहीं था कि Section 54F नाम का प्रावधान मौजूद है, बल्कि यह था कि क्या पति से खरीदी गई संपत्ति में किया गया निवेश इस छूट के लिए योग्य माना जा सकता है।
ITAT ने महिला को क्यों दी राहत?
मुंबई ITAT ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर माना कि केवल पति से संपत्ति खरीदे जाने के कारण Section 54F की छूट को खारिज नहीं किया जा सकता। Tribunal के आदेश में पहले के फैसलों का भी सहारा लिया गया, जिनमें पर्याप्त consideration देकर परिवार के सदस्य से खरीदी गई संपत्ति पर Section 54/54F की छूट को स्वीकार किया गया था।
इसके बाद Tribunal ने Section 54F के तहत की गई करीब ₹6.92 करोड़ की deduction/disallowance को हटाने का निर्देश दिया और महिला की अपील स्वीकार कर ली।
फैसले का व्यापक मतलब
यह फैसला यह नहीं कहता कि पति-पत्नी के बीच हर संपत्ति लेनदेन पर Section 54F की छूट अपने आप मिल जाएगी। ऐसे मामलों में वास्तविक खरीद, भुगतान, दस्तावेज, समयसीमा और Section 54F की अन्य वैधानिक शर्तें महत्वपूर्ण रहती हैं।
इस मामले में ITAT का फैसला उपलब्ध रिकॉर्ड और संबंधित परिस्थितियों पर आधारित था। इसलिए इसे एक case-specific tax ruling के रूप में देखना जरूरी है, न कि हर पति-पत्नी के बीच संपत्ति खरीद पर लागू होने वाला स्वतः नियम।
मुंबई ITAT का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें Tribunal ने पति से संपत्ति खरीदने और टैक्स लाभ लेने के बीच सीधे तौर पर कोई निषेध नहीं माना, जब लेनदेन वास्तविक हो और कानून की अन्य शर्तें पूरी होती हों।
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