मुंबई की नगर राजनीति कभी स्थायी मित्रता पर आधारित नहीं रही। यहां सत्ता की राजनीति हमेशा बदलते समीकरणों, रणनीतिक साझेदारियों और अचानक टूटने वाले गठबंधनों से संचालित होती रही है। इसका एक ही बड़ा कारण है — देश की सबसे समृद्ध महानगरपालिका, बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) पर नियंत्रण।
आगामी BMC चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं, पुराने राजनीतिक पैटर्न एक बार फिर उभरने लगे हैं। पुराने सहयोगी अपने रिश्तों पर पुनर्विचार कर रहे हैं, कट्टर प्रतिद्वंद्वी नए समीकरण तलाश रहे हैं और राजनीतिक दल विचारधारा तथा चुनावी गणित के बीच संतुलन साधने में जुटे हैं।
बदलते गठबंधनों का शहर
मुंबई की नगर राजनीति का इतिहास बार-बार बदलते गठबंधनों से भरा पड़ा है। जिन दलों ने कभी एक-दूसरे के खिलाफ तीखा संघर्ष किया, वही समय आने पर सत्ता में साझेदार बने। परिस्थितियां बदलीं तो वही गठबंधन टूट भी गए। यह बदलाव अक्सर व्यक्तिगत टकराव से नहीं, बल्कि मुंबई के जटिल मतदाता ढांचे, वार्ड-स्तरीय समीकरणों और BMC की अपार आर्थिक व प्रशासनिक शक्ति से प्रेरित रहे हैं।
शिवसेना: विचारधारा से व्यावहारिक राजनीति तक
मुंबई में शिवसेना की राजनीतिक यात्रा इस लचीलापन की सबसे स्पष्ट मिसाल है। मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की मजबूत विचारधारा पर खड़ी यह पार्टी, आवश्यकता पड़ने पर वैचारिक सीमाओं से परे जाकर गठबंधन करने से कभी नहीं हिचकी।
1960 के दशक के अंत में समाजवादी दलों के साथ गठजोड़ से लेकर 1970 के दशक में रिपब्लिकन पार्टी के गुटों के साथ अप्रत्याशित समझौतों तक, शिवसेना ने कई बार राजनीतिक विश्लेषकों को चौंकाया। भाजपा के साथ उसका दीर्घकालिक गठबंधन — जिसमें सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों शामिल रहे — लगभग दो दशकों तक मुंबई की राजनीति पर हावी रहा। हालांकि 2017 के BMC चुनावों से पहले इस रिश्ते में दरार साफ दिखाई देने लगी।
2022 में पार्टी विभाजन के बाद समीकरण और जटिल हो गए। आज उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) नए विकल्पों पर विचार कर रही है, वहीं जरूरत पड़ने पर अकेले चुनाव लड़ने का संकेत भी दे रही है।
कांग्रेस: प्रभुत्व से रणनीतिक सतर्कता तक
एक समय मुंबई की राजनीति पर पूरी तरह हावी रहने वाली कांग्रेस आज कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी माहौल में खुद को स्थापित करने की कोशिश कर रही है। स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक नगर निगम चुनाव कांग्रेस के भीतर गुटीय संघर्ष तक सीमित रहते थे। लेकिन शिवसेना, भाजपा और अन्य क्षेत्रीय दलों के उभार ने उस वर्चस्व को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।
प्रासंगिक बने रहने के लिए कांग्रेस ने समय-समय पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) और अन्य गठबंधनों का सहारा लिया। पार्टी नेताओं का मानना है कि इन गठबंधनों से अल्पकालिक लाभ तो मिला, लेकिन संगठनात्मक मजबूती को नुकसान भी पहुंचा।
इसी अनुभव के चलते अब पार्टी का मुंबई नेतृत्व BMC चुनाव अकेले लड़ने पर जोर दे रहा है। नेतृत्व का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनाव जमीनी स्तर पर संगठन को फिर से मजबूत करने का अवसर हैं, न कि केवल सहयोगियों पर निर्भर रहने का माध्यम।
भाजपा और महायुति की रणनीति
सत्तारूढ़ पक्ष में भाजपा मुंबई की सबसे संगठित और संसाधन-संपन्न पार्टी के रूप में BMC चुनावी मैदान में उतर रही है। हालांकि उसकी रणनीति गठबंधन आधारित है। भाजपा, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजित पवार की NCP से मिलकर बनी महायुति संयुक्त रणनीति पर काम कर रही है।
सीटों के बंटवारे को लेकर भाजपा नेताओं का कहना है कि निर्णय ‘तकनीकी और रणनीतिक’ आधार पर लिए जाएंगे। यानी वार्ड-स्तरीय गणित और जमीनी समीकरण प्राथमिक भूमिका निभाएंगे। उद्देश्य स्पष्ट है — मतों का बिखराव रोकना और सत्ता पर पकड़ बनाए रखना।
गठबंधन बार-बार क्यों बदलते हैं?
मुंबई की राजनीति में गठबंधन बदलने के पीछे मुख्य रूप से तीन कारण हैं:
आगे क्या?
जैसे-जैसे चुनावी तैयारियां तेज होंगी, मुंबई एक बार फिर नए गठबंधनों या मौजूदा समझौतों के टूटने का गवाह बन सकती है। कुछ दल भाजपा के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए एकजुटता को जरूरी मानते हैं, जबकि अन्य अपनी पहचान और संगठन बचाने के लिए स्वतंत्र रास्ता चुनने के पक्षधर हैं।
इतिहास एक बात साफ करता है — मुंबई की BMC राजनीति में स्थायित्व अपवाद है। यहां नियम हमेशा एक ही रहा है: आज का सहयोगी, कल का प्रतिद्वंद्वी हो सकता है।
From BMC updates, local area developments, railway station news, and crime reports to the latest in politics, sports, Bollywood, lifestyle, travel, and education, we bring you news that’s relevant, reliable, and real-time
Undercover Editor © 2025 – Designed by iCreato