₹15 लाख रिश्वत मामले में मुंबई के निलंबित जज पर मुकदमे की तैयारी, ACB ने अभियोजन मंजूरी मांगी

₹15 लाख रिश्वत मामले में मुंबई के निलंबित जज पर मुकदमे की तैयारी, ACB ने अभियोजन मंजूरी मांगी

क्लर्क पर जज के नाम पर रिश्वत लेने का आरोप; फोरेंसिक जांच में कथित बातचीत और वॉयस सैंपल का मिलान

मुंबई: मुंबई सिटी सिविल एंड सेशंस कोर्ट के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार मामले में कार्रवाई आगे बढ़ सकती है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने जज के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अभियोजन मंजूरी मांगी है। जज फिलहाल निलंबित हैं।

ACB ने जुलाई में अभियोजन मंजूरी के लिए अपना प्रस्ताव कानून एवं न्याय विभाग को भेजा था। विभाग ने इसे सक्षम प्राधिकारी के फैसले के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट भेज दिया है। ACB के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, मंजूरी मिलने के बाद ही मामले में चार्जशीट दाखिल की जाएगी।

₹15 लाख रिश्वत लेने का आरोप

मामला नवंबर 2025 में दर्ज FIR से जुड़ा है। ACB ने उस समय जज की अदालत में क्लर्क-कम-टाइपिस्ट चंद्रकांत वासुदेव को कथित तौर पर ₹15 लाख रिश्वत लेते गिरफ्तार किया था।

ACB का आरोप है कि क्लर्क ने एक सिविल विवाद में शिकायतकर्ता के पक्ष में आदेश दिलाने के बदले रिश्वत की मांग की थी और कथित तौर पर यह रकम जज की ओर से ली गई थी। जज को इस मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया था।

ACB के अनुसार, जज को कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए सीधे रंगे हाथ नहीं पकड़ा गया था। इसलिए जांच में उनकी कथित भूमिका स्थापित करने के लिए बातचीत की फोरेंसिक जांच कराई गई।

बातचीत की रिकॉर्डिंग और वॉयस सैंपल की जांच

ACB अधिकारी के मुताबिक, स्टेट फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी की रिपोर्ट में कथित बातचीत की पुष्टि हुई और आवाज के नमूने का भी मिलान किया गया। इसके बाद एजेंसी ने अभियोजन मंजूरी के लिए आवेदन करने का फैसला किया।

जांच के दौरान ACB ने जज और क्लर्क के बीच अदालत के समय के बाद हुई कई फोन कॉल्स की भी जानकारी जुटाई। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट से अनुमति लेकर जज के परिसर की तलाशी और आगे की जांच की गई।

दिसंबर 2025 में नोटिस मिलने के बाद जज ACB के सामने पेश हुए थे। जांच के दौरान उनका वॉयस सैंपल लिया गया और मोबाइल फोन भी आगे की जांच के लिए जब्त किया गया।

ऐसे शुरू हुआ था मामला

ACB के अनुसार, मामला सितंबर 2025 में शुरू हुआ। शिकायतकर्ता एक कंपनी की जमीन पर कथित जबरन कब्जे से जुड़े सिविल विवाद में शामिल था। 9 सितंबर को सुनवाई के दौरान जज के अदालत में तैनात क्लर्क ने शिकायतकर्ता के सहयोगी से कथित तौर पर संपर्क किया और कहा कि यदि “साहब के लिए कुछ किया जाए” तो उसके पक्ष में आदेश हो सकता है।

इसके बाद कथित तौर पर ₹25 लाख की मांग की गई, जिसमें ₹15 लाख जज और ₹10 लाख क्लर्क के लिए बताए गए। बाद में कथित तौर पर रकम घटाकर ₹15 लाख कर दी गई।

8 नवंबर को कथित तौर पर धमकी भरी बातचीत के बाद शिकायतकर्ता ने ACB से संपर्क किया। इसके बाद एजेंसी ने जाल बिछाया और 11 नवंबर 2025 को क्लर्क को कथित तौर पर ₹15 लाख स्वीकार करते हुए गिरफ्तार किया।

ACB का दावा है कि इसके बाद क्लर्क के मोबाइल से जज को WhatsApp कॉल की गई, जिसमें कथित तौर पर रिश्वत की रकम मिलने की जानकारी दी गई। एजेंसी के मुताबिक, बातचीत में कथित तौर पर जज ने रकम अपने घर लाने को कहा। इस बातचीत की रिकॉर्डिंग स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में किए जाने का दावा किया गया है।

अभियोजन मंजूरी का इंतजार

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत सार्वजनिक सेवक के खिलाफ कथित आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े अपराध में अदालत द्वारा संज्ञान लेने से पहले अभियोजन मंजूरी आवश्यक होती है। कानून का उद्देश्य अधिकारियों को झूठी या बेबुनियाद शिकायतों से संरक्षण देना भी है।

क्लर्क चंद्रकांत वासुदेव को दिसंबर 2025 में जमानत मिल चुकी है, जबकि जज फिलहाल निलंबित हैं। उनके खिलाफ विभागीय जांच अभी शुरू नहीं हुई है।

अब पूरे मामले में अगला महत्वपूर्ण कदम अभियोजन मंजूरी पर सक्षम प्राधिकारी का फैसला होगा। मंजूरी मिलने के बाद ही ACB अदालत में चार्जशीट दाखिल कर सकेगी। जज के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी जांच एजेंसी के आरोप हैं और मामले में अंतिम दोष सिद्ध होना अदालत के फैसले पर निर्भर करेगा।

 

Undercover Editor

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