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औपनिवेशिक अभिजात वर्ग से जनप्रतिनिधियों तक: मुंबई के नगरसेवकों का विकास

औपनिवेशिक अभिजात वर्ग से जनप्रतिनिधियों तक: मुंबई के नगरसेवकों का विकास

औपनिवेशिक अभिजात वर्ग से जनप्रतिनिधियों तक: मुंबई के नगरसेवकों का विकास मुंबई | अंडरकवर एडिटर न्यूज़ चैनल, 08 फरवरी 2026 मुंबई: पिछले 150 वर्षों में मुंबई के नगरसेवकों की भूमिका में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला है। कभी एक सीमित, औपनिवेशिक व्यवस्था का हिस्सा रहे नगरसेवक आज एक पूर्णतः लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत चुने गए जनप्रतिनिधि हैं, जो महानगर की विविध आबादी की सेवा करते हैं। इस यात्रा की शुरुआत 26 जुलाई 1875 को हुई, जब तत्कालीन बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के लिए पहले चुनाव आयोजित किए गए। उस समय केवल लगभग 1,200 नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त था, जो शहर की कुल जनसंख्या का बेहद छोटा हिस्सा था। मतदान का अधिकार केवल कर-दाताओं तक सीमित था, जिससे राजनीतिक भागीदारी अमीर और प्रभावशाली वर्ग तक ही सिमट कर रह गई। परिणामस्वरूप, उस दौर में चुने गए 64 नगरसेवक मुख्यतः संपन्न और अभिजात वर्ग से आते थे। औपनिवेशिक नींव और सीमित लोकतंत्र मुंबई नगर निगम की औपचारिक स्थापना वर्ष 1872 में बॉम्बे अधिनियम के तहत हुई थी। प्रारंभ में सभी 64 नगरसेवक ब्रिटिश सरकार या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा नामित किए जाते थे। बाद में हुए सुधारों के तहत आधे नगरसेवकों को चुनाव के माध्यम से चुने जाने की अनुमति मिली, लेकिन मताधिकार अब भी “रेट पेयर्स” तक सीमित था, जो न्यूनतम वार्षिक कर का भुगतान करते थे। 1872 में मुंबई की कुल जनसंख्या लगभग 6.44 लाख थी, लेकिन इनमें से केवल 4,000 से भी कम लोग मतदान के पात्र थे — यानी महज 0.6 प्रतिशत। इसके बावजूद दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता और विष्णुनाथ नारायण मंडलिक जैसे प्रतिष्ठित नेताओं ने प्रारंभिक नागरिक शासन को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई और व्यापक प्रतिनिधित्व के लिए निरंतर प्रयास किए। स्वतंत्रता के बाद सुधार और व्यापक भागीदारी मुंबई के नागरिक निकाय का वास्तविक लोकतंत्रीकरण स्वतंत्रता के बाद तेज़ी से आगे बढ़ा। वर्ष 1922 में किरायेदारों को मतदान का अधिकार दिए जाने से मतदाता आधार में उल्लेखनीय विस्तार हुआ। एक बड़ा बदलाव 1952 में आया, जब नामांकित नगरसेवकों की व्यवस्था समाप्त कर दी गई और नगर निगम को पूर्णतः निर्वाचित संस्था बना दिया गया। 1931 में ‘प्रेसीडेंट’ पद का नाम बदलकर ‘मेयर’ किया गया, जो लोकतांत्रिक सोच का प्रतीक था, हालांकि यह पद लंबे समय तक औपचारिक ही बना रहा। वर्ष 1956 में सुलोचना मोदी के मुंबई की पहली महिला मेयर चुने जाने के साथ ही समावेशी प्रतिनिधित्व की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठा। जन राजनीति का उदय और ‘नगरसेवक’ की भूमिका 1960 के दशक के उत्तरार्ध में एक और निर्णायक मोड़ आया, जब स्थानीय निकाय चुनावों को चुनाव आयोग की निगरानी में लाया गया। इसी दौर में नगर पार्षदों को ‘नगरसेवक’ कहा जाने लगा, जिसने उन्हें जनता के सेवक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद के वर्षों में श्रमिक आंदोलनों, सामाजिक संघर्षों और मध्यवर्गीय नेतृत्व के उभार के चलते राजनीतिक जागरूकता बढ़ी। मुंबई की नगर राजनीति में अब आम नागरिकों की आकांक्षाएं अधिक स्पष्ट रूप से झलकने लगीं। 1980 के दशक तक कई राजनीतिक दलों ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) में मजबूत उपस्थिति दर्ज करा ली। व्यापक प्रतिनिधित्व और संरचनात्मक बदलाव लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करने के लिए महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए सीटें आरक्षित की गईं। वर्ष 1998 में ‘मेयर-इन-काउंसिल’ प्रणाली के माध्यम से निर्वाचित प्रतिनिधियों को अधिक अधिकार देने का प्रयास किया गया, हालांकि प्रशासनिक असंतुलन के कारण इसे बाद में वापस ले लिया गया। आज मुंबई के नगरसेवक नागरिक प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे विकास कार्यों का समन्वय करते हैं, जनसमस्याओं को सदन में उठाते हैं, विभिन्न समितियों के माध्यम से नीतिगत निर्णयों में भाग लेते हैं और प्रशासन तथा नागरिकों के बीच सेतु का काम करते हैं। बदली हुई नागरिक संस्था एक छोटे से औपनिवेशिक अभिजात वर्ग द्वारा नियंत्रित संस्था से लेकर एक व्यापक जनाधारित लोकतांत्रिक निकाय तक, मुंबई के नगरसेवकों का यह विकास शहर की सामाजिक-राजनीतिक यात्रा का प्रतीक है। आज 227 निर्वाचित नगरसेवकों के साथ बीएमसी देश की सबसे बड़ी और सबसे समृद्ध नगर पालिका के रूप में खड़ी है, जो इस बात का प्रमाण है कि मुंबई का नागरिक शासन धीरे-धीरे जनता के और अधिक करीब आया है।

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