Category: Education

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पुणे में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 11वें दिन भी जारी, आज मुंबई में मंत्री से मुलाकात

पुणे में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 11वें दिन भी जारी, आज मुंबई में मंत्री से मुलाकात

पुणे में आदिवासी छात्रों का आंदोलन 11वें दिन भी जारी, आज मुंबई में मंत्री से मुलाकात छात्र प्रतिनिधिमंडल की आदिवासी विकास मंत्री से मुलाकात, छात्रावासों की सुरक्षा और ₹1 करोड़ बीमा समेत कई मांगें पुणे/मुंबई: पुणे के आदिवासी सरकारी छात्रावास में छात्रों का आंदोलन सोमवार को 11वें दिन भी जारी रहा। अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाने के लिए 10 छात्रों का प्रतिनिधिमंडल आज मुंबई पहुंचकर आदिवासी विकास मंत्री प्रो. डॉ. अशोक रामाजी उईके से मंत्रालय में मुलाकात करेगा। छात्र मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी मुलाकात कर अपनी मांगें रखने की कोशिश करेंगे। हड़ताल में शामिल छह छात्र—श्वेता गिरनाक (26), निकिता मेचकर (22), शरद थोकल (26), विजय भांदबल (25), राहुल धनवे (26) और राजाराम पाडवी (20)—पुणे के हडपसर-मांजरी सीमा के पास स्थित आदिवासी सरकारी बालक छात्रावास में अनशन जारी रखे हुए हैं। सरकार के 14 अगस्त के GR को वापस लेने की मांग छात्रों की प्रमुख मांगों में महाराष्ट्र सरकार द्वारा 14 अगस्त 2026 को जारी आदिवासी छात्रावासों से संबंधित शासन निर्णय (GR) को वापस लेना शामिल है। छात्र संगठन का कहना है कि नया आदेश मौजूदा परिस्थितियों और बढ़ती महंगाई को ध्यान में रखते हुए तैयार किया जाना चाहिए। छात्रों ने 11 नवंबर 2011 के GR के आधार पर संशोधित आदेश जारी करने की मांग की है। साथ ही छात्रावासों में मिलने वाले भत्तों और अन्य आर्थिक सुविधाओं को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से जोड़ने की मांग की गई है, ताकि महंगाई के अनुसार इन सुविधाओं में हर साल बढ़ोतरी हो सके। छात्रावासों में सुरक्षा और ₹1 करोड़ बीमा की मांग आदिवासी छात्रों ने छात्रावासों और आश्रम स्कूलों में रहने वाले विद्यार्थियों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की है। इसके अलावा प्रत्येक आदिवासी छात्र के लिए ₹1 करोड़ का बीमा कवर देने की मांग भी रखी गई है। यह मांग गडचिरोली में सांप के जहर से तीन आदिवासी छात्रों की हालिया मौत के बाद और महत्वपूर्ण हो गई है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने मृत छात्रों के परिवारों को ₹1 करोड़ का मुआवजा देने की भी मांग की है। महिला छात्रों के लिए सुरक्षित छात्रावास की मांग छात्रों ने पुणे में आदिवासी छात्राओं के लिए सुरक्षित और सभी जरूरी सुविधाओं से लैस केंद्रीय छात्रावास भवन बनाने की मांग भी की है। इसके अलावा छात्रावासों और आश्रम स्कूलों में खाली पड़े पदों को तत्काल भरने की मांग की गई है। इनमें चपरासी, सुरक्षा गार्ड और सफाई कर्मचारियों के पद शामिल हैं। छात्रों का कहना है कि नियमित भर्ती पूरी होने तक इन पदों पर स्थायी या अनुबंध के आधार पर कर्मचारियों की नियुक्ति की जाए। पहले भी हो चुकी है मंत्री और अधिकारियों से बैठक छात्र प्रतिनिधियों ने 18 अगस्त को आदिवासी विकास मंत्री अशोक उईके से मुलाकात की थी। इसके बाद 22 अगस्त को आदिवासी विकास विभाग के अतिरिक्त आयुक्त और अन्य अधिकारियों के साथ भी बैठक हुई। हालांकि, मांगों पर ठोस समाधान नहीं निकलने के बाद छात्रों का आंदोलन और अनशन जारी है। अब छात्रों की नजर आज मुंबई में होने वाली बैठक पर है। प्रदर्शनकारी उम्मीद कर रहे हैं कि सरकार उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय लेकर आदिवासी छात्रों की सुरक्षा, शिक्षा और छात्रावासों से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान करेगी।  
राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल बिना भवन के, 2,047 स्कूलों में शौचालय नहीं; सरकारी आंकड़ों से खुली शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर

राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल बिना भवन के, 2,047 स्कूलों में शौचालय नहीं; सरकारी आंकड़ों से खुली शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर

राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल बिना भवन के, 2,047 स्कूलों में शौचालय नहीं; सरकारी आंकड़ों से खुली शिक्षा व्यवस्था की तस्वीर जयपुर: राजस्थान की सरकारी स्कूल व्यवस्था को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राज्य सरकार के अनुसार राजस्थान में 611 सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जिनके पास अपना भवन नहीं है। इनमें 10 बालिका विद्यालय भी शामिल हैं। यह जानकारी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीका राम जूली के सवाल के जवाब में राज्य सरकार ने दी। सरकार के मुताबिक ये आंकड़े UDISE 2025-26 के हैं और समग्र शिक्षा अभियान के तहत दर्ज किए गए हैं। जयपुर में 38 स्कूल बिना भवन राजधानी जयपुर में ही 38 सरकारी स्कूल बिना भवन के संचालित हो रहे हैं। सबसे ज्यादा ऐसे स्कूल झालावाड़ जिले के अकलेरा ब्लॉक में हैं, जहां 23 स्कूलों के पास अपना भवन नहीं है। इसके बाद खानपुर में 16 और झालरापाटन में 11 स्कूल हैं। फालोदी के बाप में 11 और बांसवाड़ा के छोटीसड़वन में 10 स्कूल बिना भवन के हैं। 2,047 स्कूलों में शौचालय नहीं सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में अपने भवन वाले 64,484 सरकारी स्कूलों में से 2,047 स्कूलों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। शौचालय की कमी के मामले में बांसवाड़ा 188 स्कूलों के साथ सबसे आगे है। इसके बाद डूंगरपुर में 124 और उदयपुर में 98 स्कूलों में शौचालय सुविधा नहीं है। बीकानेर, झालावाड़ और जैसलमेर भी प्रभावित जिलों में शामिल हैं। 1,049 स्कूलों में पीने का पानी नहीं बुनियादी सुविधाओं की स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। 1,049 सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा भी उपलब्ध नहीं है। इनमें दौसा के 96, उदयपुर के 70, अलवर के 65, करौली के 60 और बांसवाड़ा के 58 स्कूल शामिल हैं। 3,768 स्कूल जर्जर और असुरक्षित होने का दावा नेता प्रतिपक्ष टीका राम जूली ने सरकार पर स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए ठोस योजना नहीं होने का आरोप लगाया। उन्होंने पिछले साल हुए एक ऑडिट का हवाला देते हुए कहा कि 3,768 सरकारी स्कूल पूरी तरह जर्जर और उपयोग के लिए असुरक्षित घोषित किए गए हैं। उनके मुताबिक, ऐसे स्कूलों को बंद या दूसरी जगह स्थानांतरित किए जाने से विद्यार्थियों के नामांकन पर भी असर पड़ा है। जूली ने यह भी दावा किया कि राज्य के सरकारी स्कूलों में 83,783 कमरे जर्जर और असुरक्षित हैं। सरकार ने ₹3,000 करोड़ से अधिक के प्रावधान बताए राज्य सरकार ने बताया कि स्कूलों की मरम्मत और नवीनीकरण के लिए ₹550 करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। वहीं बिना भवन वाले और जर्जर भवनों में चल रहे स्कूलों के लिए नए भवनों के निर्माण हेतु ₹450 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा स्कूलों के नए निर्माण, मरम्मत और रखरखाव के लिए हर साल ₹2,500 करोड़ और पांच वर्षों में कुल ₹12,500 करोड़ उपलब्ध कराने की बात सरकार ने कही है। इसके लिए DMFT, समग्र शिक्षा, राज्य निधि, VB-G RAM-G, सांसद/विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास निधि, SDRF और CSR सहित विभिन्न स्रोतों से धन जुटाया जाएगा। यह मुद्दा ऐसे समय सामने आया है जब राजस्थान के सरकारी स्कूलों की जमीनी स्थिति को लेकर निरीक्षण और विरोध का दौर जारी है। ऐसे में सरकार के सामने अब इन आंकड़ों को सुधारने के साथ-साथ विद्यार्थियों को सुरक्षित भवन, शौचालय और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की बड़ी चुनौती है।  
NEET-UG विरोध पर सुप्रीम कोर्ट की सलाह: युवाओं को समझाएं, दमन नहीं—CJI सूर्यकांत

NEET-UG विरोध पर सुप्रीम कोर्ट की सलाह: युवाओं को समझाएं, दमन नहीं—CJI सूर्यकांत

NEET-UG विरोध पर सुप्रीम कोर्ट की सलाह: युवाओं को समझाएं, दमन नहीं—CJI सूर्यकांत नई दिल्ली: NEET-UG पेपर लीक को लेकर देशभर में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को अहम सलाह दी है। अदालत ने कहा कि युवाओं और छात्रों के साथ सख्ती के बजाय संवाद, समझाइश और संयम का रास्ता अपनाना ज्यादा प्रभावी होगा। ⚖️ “युवाओं को सुनना ही सबसे बड़ा समाधान” मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि युवाओं को दबाने की बजाय उनकी बात सुनना और उन्हें शांत करना बेहतर विकल्प है। अदालत ने टिप्पणी की, “सबसे ताकतवर तरीका है—तर्क, संवाद और उन्हें सुनना। आक्रामक रवैया स्थिति को और बिगाड़ सकता है।” 🔍 याचिका में क्या कहा गया? यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें आरोप लगाया गया था कि NEET-UG विरोध प्रदर्शनों के आयोजकों के खिलाफ अभी तक सख्त कार्रवाई नहीं हुई है। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि कुछ प्रदर्शन हिंसक हो गए हैं और कानून व्यवस्था पर असर पड़ा है। ⚠️ हिंसा पर कोर्ट की चिंता सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी माना कि शांतिपूर्ण आंदोलन कभी-कभी हिंसक रूप ले सकते हैं। ऐसे में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संयम बरतने की जरूरत है ताकि स्थिति नियंत्रण से बाहर न हो। 🧑‍⚖️ “आक्रामकता से हालात बिगड़ेंगे” कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस या प्रशासन आक्रामक रुख अपनाता है, तो इससे हालात और तनावपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए अधिकारियों को बेहद सावधानी और संवेदनशीलता के साथ कदम उठाने चाहिए। 📅 अगली सुनवाई 18 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को अन्य संबंधित मामलों के साथ जोड़ते हुए 18 अगस्त को अगली सुनवाई की तारीख तय की है। 🔍 निष्कर्ष: सुप्रीम कोर्ट का यह संदेश साफ है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे संभालने का तरीका भी उतना ही अहम है। युवाओं के साथ संवाद और समझदारी से काम लेना ही स्थायी समाधान की दिशा में बेहतर कदम माना जा रहा है।
स्कूलों के बाहर जंक फूड पर रोक: महाराष्ट्र FDA के फैसले की डॉक्टरों ने की सराहना, बोले—“बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा कदम”

स्कूलों के बाहर जंक फूड पर रोक: महाराष्ट्र FDA के फैसले की डॉक्टरों ने की सराहना, बोले—“बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा कदम”

स्कूलों के बाहर जंक फूड पर रोक: महाराष्ट्र FDA के फैसले की डॉक्टरों ने की सराहना, बोले—“बच्चों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा कदम” मुंबई: महाराष्ट्र सरकार द्वारा स्कूलों के आसपास जंक फूड की बिक्री पर रोक लगाने के फैसले को डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम बताया है। राज्य के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) की इस कार्रवाई का मकसद बच्चों में बढ़ती मोटापा और अस्वस्थ खानपान की समस्या पर लगाम लगाना है। 🍔 स्कूलों के पास जंक फूड पर सख्त प्रतिबंध नए नियमों के तहत स्कूलों के 50 मीटर के दायरे में वड़ा पाव, समोसा और अन्य तले-भुने व अधिक वसा, नमक और शक्कर (HFSS) वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। इसके साथ ही सभी फूड बिजनेस ऑपरेटर्स के लिए FSSAI लाइसेंस लेना अनिवार्य कर दिया गया है और नियमित निरीक्षण भी सुनिश्चित किया जाएगा। 👨‍⚕️ डॉक्टरों ने बताया ‘पब्लिक हेल्थ के लिए बड़ा कदम’ मुंबई के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने इस फैसले को केवल एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल बताया है। डॉक्टरों का मानना है कि यह कदम बच्चों के खानपान की आदतों में सुधार लाने और मोटापे जैसी समस्याओं को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है। 📊 करोड़ों बच्चों पर पड़ेगा असर यह फैसला पूरे महाराष्ट्र के 1.08 लाख से अधिक स्कूलों और करीब 2 करोड़ छात्रों पर लागू होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को ध्यान में रखते हुए यह नीति व्यापक स्तर पर बदलाव ला सकती है। 🧠 छोटी उम्र में बनती हैं खानपान की आदतें डॉक्टरों का कहना है कि बच्चों की खाने की आदतें कम उम्र में ही बन जाती हैं और स्कूल का माहौल इसमें बड़ी भूमिका निभाता है। अगर स्कूल के आसपास जंक फूड आसानी से उपलब्ध रहेगा, तो बच्चे उसे सामान्य और रोजमर्रा का हिस्सा मानने लगते हैं। इस रोक से इस ‘नॉर्मलाइजेशन’ को तोड़ने में मदद मिलेगी। 🥗 सिर्फ प्रतिबंध नहीं, बेहतर विकल्पों पर भी जोर इस नीति में केवल जंक फूड पर रोक ही नहीं, बल्कि संतुलित आहार को बढ़ावा देने की भी योजना है। स्कूलों में फल, दालें और साबुत अनाज जैसे हेल्दी विकल्पों को प्रोत्साहित किया जाएगा, जिससे बच्चों को बेहतर पोषण मिल सके। ⚖️ सफलता निर्भर करेगी सख्ती और सहयोग पर हालांकि, डॉक्टरों ने यह भी कहा कि इस नीति की सफलता पूरी तरह इसके सही क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। ये सभी कारक मिलकर ही इस पहल को सफल बना पाएंगे। 🔍 निष्कर्ष: महाराष्ट्र सरकार का यह कदम बच्चों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की दिशा में एक मजबूत शुरुआत माना जा रहा है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देगा जब इसे जमीनी स्तर पर पूरी सख्ती से लागू किया जाए और समाज के सभी वर्ग इसमें सक्रिय भूमिका निभाएं।  
धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से दिया इस्तीफा, छात्र आंदोलन के दबाव में बड़ा फैसला

धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से दिया इस्तीफा, छात्र आंदोलन के दबाव में बड़ा फैसला

धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्री पद से दिया इस्तीफा, छात्र आंदोलन के दबाव में बड़ा फैसला नई दिल्ली: देशभर में चल रहे छात्र आंदोलन और NEET पेपर लीक विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। पिछले एक महीने से दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र प्रदर्शन में उनकी इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दा बनी हुई थी। सूत्रों के अनुसार, धर्मेंद्र प्रधान ने शनिवार को अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री को सौंप दिया। उन्होंने अपने आधिकारिक X (पूर्व में ट्विटर) अकाउंट के माध्यम से इसकी घोषणा की, जो केंद्र सरकार और आंदोलनकारी संगठन के बीच तीसरे दौर की वार्ता से कुछ ही घंटे पहले सामने आई। जंतर-मंतर पर डटे छात्र लंबे समय से परीक्षा में गड़बड़ी और NEET पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, छात्रों पर किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई न होना, और पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देना शामिल था। शुक्रवार को केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों की दो मांगों — कानूनी कार्रवाई न करने और मुआवजे — पर सहमति जताई थी, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के मुद्दे पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया था। इसके चलते वार्ता गतिरोध में फंस गई थी। अपने इस्तीफे की घोषणा करते हुए धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “मैं देश के युवाओं की आकांक्षाओं और भावनाओं का गहरा सम्मान करता हूं। युवाओं के सपनों को साकार करना हमारे सार्वजनिक जीवन का नैतिक संकल्प रहा है।” उन्होंने आगे कहा कि देश की एकता बनाए रखने और छात्रों के भविष्य को किसी भी तरह की कानूनी जटिलताओं से बचाने के उद्देश्य से उन्होंने यह निर्णय लिया है। जैसे ही उनके इस्तीफे की खबर सामने आई, जंतर-मंतर पर मौजूद प्रदर्शनकारियों में खुशी की लहर दौड़ गई। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे संगठन ने इसे “छात्र शक्ति की जीत” बताया। संगठन के संस्थापक अभिजीत दिपके ने मंच से घोषणा करते हुए कहा, “हमने कर दिखाया। यह साबित हो गया कि छात्रों की आवाज़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।” पिछले कुछ दिनों में यह आंदोलन देश के कई शहरों में फैल चुका था और एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था। विपक्षी दलों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया और सरकार को लगातार घेरने का प्रयास किया। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस मुद्दे पर आगे क्या कदम उठाती है और छात्रों का भरोसा कैसे बहाल किया जाएगा।  
सरकार से बातचीत के बाद भी जारी CJP का आंदोलन: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी

सरकार से बातचीत के बाद भी जारी CJP का आंदोलन: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी

सरकार से बातचीत के बाद भी जारी CJP का आंदोलन: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर अड़े प्रदर्शनकारी नई दिल्ली: देशभर में जारी ‘कॉकroach जनता पार्टी’ (CJP) के नेतृत्व में हो रहे छात्र आंदोलन के बीच सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत हुई है, लेकिन गतिरोध अभी भी बना हुआ है। CJP के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा नहीं देते, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। CJP के प्रवक्ता आशुतोष रंका ने बताया कि सरकार ने उनकी मुख्य मांग—धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे—पर फैसला लेने के लिए एक दिन का समय मांगा है। उन्होंने कहा कि यदि जल्द ही इस पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो देशभर में और बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन किए जाएंगे। यह आंदोलन पिछले एक महीने से जारी है, लेकिन हाल ही में दिल्ली में संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई के बाद यह और तेज हो गया। इस कार्रवाई में कई लोग घायल हुए थे, जिससे देशभर में आक्रोश बढ़ा। इस बीच, CJP के एक अन्य प्रवक्ता सौरव दास ने बताया कि सरकार ने कुछ अन्य मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाया है। इनमें परीक्षा रद्द होने के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की मांग शामिल है। इस मुद्दे पर आगे की बातचीत शनिवार को होने की संभावना है। गौरतलब है कि इस आंदोलन के समर्थन में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 26 दिनों तक भूख हड़ताल की थी, जिसे उन्होंने हाल ही में समाप्त कर दिया। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया। हालांकि, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर कोई स्पष्ट वादा नहीं किया गया है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परीक्षा पेपर लीक मामले को गंभीर बताते हुए एक सख्त कानून लाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा लाखों छात्रों और उनके परिवारों के लिए चिंता का विषय है और सरकार इस पर कड़ी कार्रवाई के लिए प्रतिबद्ध है। दरअसल, हाल ही में मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET के पेपर लीक होने के बाद यह विवाद शुरू हुआ था। करीब 22.8 लाख छात्रों ने यह परीक्षा दी थी, जिसे बाद में रद्द कर दोबारा आयोजित करना पड़ा। दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे सैकड़ों छात्रों ने साफ कहा है कि वे अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेंगे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि शिक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह आंदोलन जरूरी है। निष्कर्ष: सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच बातचीत जारी है, लेकिन मुख्य मांग पर सहमति न बनने के कारण स्थिति अभी भी तनावपूर्ण बनी हुई है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन और तेज हो सकता है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।  
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर राज्यपाल का छात्रों से संवाद, बीएमसी स्कूल में मनाया गया स्कूल रीओपनिंग उत्सव

नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर राज्यपाल का छात्रों से संवाद, बीएमसी स्कूल में मनाया गया स्कूल रीओपनिंग उत्सव

नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत पर राज्यपाल का छात्रों से संवाद, बीएमसी स्कूल में मनाया गया स्कूल रीओपनिंग उत्सव मुंबई में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के अवसर पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें महाराष्ट्र के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा ने बीएमसी द्वारा संचालित मुंबई पब्लिक स्कूल, भायखला में आयोजित “स्कूल रीओपनिंग फेस्टिवल” में भाग लिया। 🎒 छात्रों के साथ संवाद, बांटे स्कूल किट और भोजन कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने विद्यार्थियों से सीधे संवाद किया और उन्हें स्कूल किट तथा पौष्टिक भोजन वितरित किया। इस अवसर पर बच्चों में खासा उत्साह देखने को मिला। 🏫 स्कूल की सुविधाओं का लिया जायजा राज्यपाल ने स्कूल की विभिन्न आधुनिक सुविधाओं का निरीक्षण भी किया। उन्होंने खगोल विज्ञान प्रयोगशाला, प्री-प्राइमरी (बालवाड़ी) कक्षाएं, स्मार्ट क्लासरूम, कंप्यूटर लैब और फाउंडेशनल लिटरेसी एंड न्यूमेरेसी (FLN) लैब का दौरा किया और व्यवस्थाओं की सराहना की। 👥 कई वरिष्ठ अधिकारी रहे मौजूद इस कार्यक्रम में बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की आयुक्त अश्विनी भिडे, बीएमसी शिक्षा समिति की अध्यक्ष राजेश्री शिरवाडकर, राज्यपाल के सचिव डॉ. प्रशांत नरनवरे, अतिरिक्त आयुक्त (शिक्षा) डॉ. अविनाश ढकने, महाराष्ट्र प्राथमिक शिक्षण परिषद (MPSP) के राज्य परियोजना निदेशक संजय यादव सहित कई गणमान्य व्यक्ति, शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी उपस्थित रहे। 📚 शिक्षा के प्रति सकारात्मक पहल इस आयोजन का उद्देश्य छात्रों को नए सत्र के लिए प्रेरित करना और शिक्षा के प्रति सकारात्मक वातावरण बनाना था। राज्यपाल की उपस्थिति ने बच्चों का उत्साह और भी बढ़ा दिया। 👉 निष्कर्ष: मुंबई के बीएमसी स्कूलों में इस तरह के आयोजन शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने और छात्रों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहे हैं।  
जंतर मंतर पर CJP का प्रदर्शन LIVE: ‘युवा अब नहीं डरेंगे’, अभिजीत दिपके के नेतृत्व में छात्रों का हुंकार

जंतर मंतर पर CJP का प्रदर्शन LIVE: ‘युवा अब नहीं डरेंगे’, अभिजीत दिपके के नेतृत्व में छात्रों का हुंकार

जंतर मंतर पर CJP का प्रदर्शन LIVE: ‘युवा अब नहीं डरेंगे’, अभिजीत दिपके के नेतृत्व में छात्रों का हुंकार नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर शनिवार (6 जून 2026) को ‘Cockroach Janta Party (CJP)’ के बैनर तले बड़ा प्रदर्शन शुरू हुआ, जिसमें देशभर से आए छात्रों और युवाओं ने हिस्सा लिया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके कर रहे हैं, जो हाल ही में अमेरिका से भारत लौटे हैं। प्रदर्शन को देखते हुए दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों को शहर के कई संवेदनशील इलाकों में तैनात किया गया है। सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा कर दिया गया है ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। अभिजीत दिपके ने जंतर मंतर पहुंचने से पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “हम इस आंदोलन को प्यार और शांति के साथ आगे बढ़ाएंगे। देश का युवा अब डरने वाला नहीं है।” उनके इस संदेश के बाद बड़ी संख्या में छात्र और युवा प्रदर्शन में शामिल होने के लिए पहुंचे। यह प्रदर्शन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि हाल के परीक्षा संबंधित मामलों में गंभीर लापरवाही हुई है, जिससे छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है। इस बीच, शिक्षा सुधारक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि यदि 5 जून तक मंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, तो वह भी इस प्रदर्शन में शामिल होंगे। जंतर मंतर पर जुटी भीड़ में छात्रों का गुस्सा और निराशा साफ नजर आ रही है। प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांगें रख रहे हैं, लेकिन उनका कहना है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। दिल्ली पुलिस के अधिकारियों के अनुसार, स्थिति फिलहाल नियंत्रण में है और प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से चल रहा है। हालांकि, प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। यह प्रदर्शन आने वाले दिनों में देश की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि इसमें युवाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है।  
📰 महाराष्ट्र SSC रिजल्ट 2026: कोंकण ने फिर मारी बाजी, मुंबई–पुणे का दबदबा कायम

📰 महाराष्ट्र SSC रिजल्ट 2026: कोंकण ने फिर मारी बाजी, मुंबई–पुणे का दबदबा कायम

📰 महाराष्ट्र SSC रिजल्ट 2026: कोंकण ने फिर मारी बाजी, मुंबई–पुणे का दबदबा कायम महाराष्ट्र में कक्षा 10वीं (SSC) परीक्षा 2026 के नतीजे घोषित हो चुके हैं और इस बार भी राज्य के अलग-अलग डिवीजनों के प्रदर्शन में बड़ा अंतर देखने को मिला है। Maharashtra State Board of Secondary and Higher Secondary Education द्वारा आयोजित इस परीक्षा में कुल पास प्रतिशत 92.09% रहा, जो एक मजबूत और संतुलित प्रदर्शन को दर्शाता है। इस साल कुल 15,42,472 नियमित छात्र परीक्षा में शामिल हुए, जिनमें से 14,20,486 छात्र सफल घोषित किए गए। हालांकि, जब डिवीजन-वाइज परिणामों का विश्लेषण किया गया, तो राज्य में क्षेत्रीय असमानता साफ तौर पर सामने आई। 📊 कोंकण बना टॉपर, फिर कायम रखा दबदबा Konkan डिवीजन ने एक बार फिर शानदार प्रदर्शन करते हुए 97.62% पास प्रतिशत के साथ राज्य में पहला स्थान हासिल किया। कम छात्रों के बावजूद यहां की शैक्षणिक गुणवत्ता और स्कूल स्तर की स्थिरता इसे लगातार टॉप पर बनाए हुए है। 🏙️ मुंबई–पुणे और कोल्हापुर: मजबूत शहरी क्लस्टर Mumbai (94.97%), Pune (94.24%) और Kolhapur (95.47%) ने भी शानदार प्रदर्शन किया। ⚖️ मध्यम प्रदर्शन वाले डिवीजन Nashik (90.53%) और Amravati (90.50%) ने औसत से थोड़ा बेहतर प्रदर्शन किया। 📉 निचले स्तर पर नागपुर, लातूर और संभाजीनगर Nagpur (89.07%), Latur (88.42%) और Chhatrapati Sambhajinagar (88.41%) अपेक्षाकृत पीछे रहे। 🔍 मुख्य निष्कर्ष: क्षेत्रीय अंतर अभी भी बड़ा मुद्दा SSC 2026 के नतीजों से यह साफ हो गया है कि महाराष्ट्र में शिक्षा का स्तर अभी भी भौगोलिक और शहरी-ग्रामीण अंतर पर निर्भर करता है। यह आंकड़े बताते हैं कि बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, संसाधन और शहरी सुविधाएं शिक्षा के परिणामों पर सीधा प्रभाव डालती हैं।
Maharashtra Restores 3km RTE Admission Rule, Deadline Extended to March 25

Maharashtra Restores 3km RTE Admission Rule, Deadline Extended to March 25

Maharashtra Restores 3km RTE Admission Rule, Deadline Extended to March 25 Mumbai: In a significant decision bringing relief to thousands of parents, the Government of Maharashtra has restored the 3-kilometre eligibility rule for admissions under the Right to Education Act (RTE) in private unaided schools. The move comes after the Bombay High Court stayed key provisions of a government resolution issued on February 12, which had reduced the permissible distance for RTE admissions from 3km to 1km. Following the court’s intervention, parents can now once again apply to schools within a 3km radius of their residence. The earlier decision had sparked concern among parents and education experts, who argued that restricting the distance to 1km significantly limited school choices, especially in urban areas where access to reputed institutions often requires travelling longer distances. Under the provisions of the RTE Act, private unaided schools are required to reserve 25% of entry-level seats for children from economically weaker and disadvantaged sections. The government reimburses the fees for these students. Families with an annual income below ₹1 lakh are eligible under the economically weaker section category . Education expert Mahendra Ganpule, former vice-president of the Maharashtra School Principals Association, welcomed the rollback. He stated that the 1km restriction had unnecessarily narrowed the scope of admissions and that parents should have the freedom to choose better schools for their children. As per the revised admission process, priority will be given based on proximity. Students residing within 1km of a school will be given first preference, followed by those living within a 1–3km radius. Applicants from beyond 3km will be considered only if seats remain vacant. Officials also revealed that around 2.24 lakh applications have already been received under the RTE quota across Maharashtra, highlighting the high demand for quality education among underprivileged sections. In a related development, the state government has extended the deadline for submitting RTE applications from March 18 to March 25, citing delays in the launch of the online application portal. The extension is expected to provide additional time for eligible parents to complete the application process. The decision is being seen as a positive step towards ensuring wider access to quality education and upholding the core objective of the RTE Act — inclusive and equitable learning opportunities for all children.

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