मझगांव के हाथी बाग इलाके में रहने वाले 43 वर्षीय मयूर मिस्त्री की कहानी इस संकट की सच्ची तस्वीर पेश करती है। बचपन से जिस 120 स्क्वायर फीट के घर में उन्होंने जीवन बिताया, आज वही घर उनके लिए खतरा बन चुका है। हाल ही में उन्हें इमारत खाली करने का नोटिस मिला, लेकिन वे और उनके जैसे कई परिवार अब भी वहीं रहने को मजबूर हैं।
दरअसल, यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि मुंबई के हजारों ‘सेस्ड बिल्डिंग्स’ में रहने वाले करीब 4 लाख लोगों की हकीकत है। ये वे इमारतें हैं जो 1969 से पहले बनी थीं और अब बेहद जर्जर हालत में हैं। सरकारी सर्वे के अनुसार, शहर में 12,000 से ज्यादा ऐसी इमारतें हैं, जिनमें से कई को ‘खतरनाक’ घोषित किया जा चुका है।
हर मानसून में यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। दीवारों में दरारें, छत से पानी टपकना, लकड़ी और लोहे के सहारे खड़ी इमारतें—ये सब आम दृश्य बन चुके हैं। इसके बावजूद लोग यहां से नहीं जाना चाहते, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर वे घर छोड़ देंगे, तो उनका वर्षों पुराना हक और मकान दोनों छिन जाएंगे।
पुनर्विकास (redevelopment) इस समस्या का समाधान हो सकता था, लेकिन यही प्रक्रिया सबसे बड़ी रुकावट बन गई है। कई परियोजनाएं सालों से अटकी हुई हैं। कहीं बिल्डर गायब हैं, तो कहीं कानूनी विवाद चल रहे हैं। कुछ मामलों में जमीन के मालिक ही सामने नहीं आते, जिससे पूरा प्रोजेक्ट ठप हो जाता है।
सरकार ने 2022 में MHADA एक्ट के तहत सेक्शन 79A लागू कर राहत देने की कोशिश की थी, जिससे किरायेदार खुद पुनर्विकास शुरू कर सकते थे। लेकिन इस कानून पर भी कोर्ट में विवाद होने के कारण फिलहाल यह प्रक्रिया ठप पड़ी है।
इस बीच, कई जगहों पर बिल्डरों द्वारा केवल सहमति लेकर प्रोजेक्ट शुरू नहीं किए गए, जिससे इमारतें और भी खराब हालत में पहुंच गईं। गिरगांव की एक 100 साल पुरानी चाल इसका उदाहरण है, जहां 10 साल पहले पुनर्विकास का वादा किया गया था, लेकिन आज तक कोई काम शुरू नहीं हुआ।
स्थिति इतनी गंभीर है कि बॉम्बे हाई कोर्ट की एक समिति ने इसे “चमत्कार” बताया है कि इतने लोग अब भी इन इमारतों में सुरक्षित रह पा रहे हैं। लेकिन यह चमत्कार कब तक चलेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि अगर लोग घर छोड़ते हैं, तो उन्हें न तो किराए की पूरी गारंटी मिलती है, न ही यह भरोसा कि नया घर कब मिलेगा। कई परिवार सालों से किराए पर रह रहे हैं, बिना किसी निश्चित भविष्य के।
ऐसे में, लोगों के सामने दो ही रास्ते हैं—या तो जान जोखिम में डालकर उसी जर्जर घर में रहें, या अनिश्चित भविष्य की ओर कदम बढ़ाएं। यही मजबूरी हर साल मानसून के दौरान मुंबई को एक बड़े हादसे के इंतजार में खड़ा कर देती है।
मुंबई की यह तस्वीर सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं, बल्कि एक गहरे सामाजिक और प्रशासनिक संकट की ओर इशारा करती है—जहां लोगों के पास “सुरक्षित जीवन” और “अपना घर” के बीच चुनाव करने की मजबूरी
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