मुंबई के सायन अस्पताल में जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर की मौत, हॉस्टल के बाथरूम में मिला शव; कार्यभार को लेकर पहले जताई थी चिंता

मुंबई के सायन अस्पताल में जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर की मौत, हॉस्टल के बाथरूम में मिला शव; कार्यभार को लेकर पहले जताई थी चिंता

मुंबई: मुंबई के सायन अस्पताल में प्रथम वर्ष के जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. शिवशरण पाटिल शनिवार शाम करीब 7:30 बजे अस्पताल के हॉस्टल के बाथरूम में मृत पाए गए। वह मूल रूप से कर्नाटक के निवासी थे और अस्पताल में सर्जरी विभाग में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर कार्यरत थे। शुरुआती जानकारी के अनुसार, वह आत्महत्या से मृत पाए गए हैं। मामले की पुलिस जांच और पोस्टमार्टम से जुड़ी आगे की जानकारी का इंतजार है।

कई घंटों तक नहीं मिले, रूममेट ने अधिकारियों को दी सूचना      

अस्पताल के अधिकारियों के अनुसार, शनिवार को डॉ. पाटिल कई घंटों तक दिखाई नहीं दिए। इसके बाद उनके रूममेट से उनकी तलाश करने को कहा गया। रूममेट ने जब उनके मोबाइल फोन पर कॉल किया, तो फोन की घंटी बाथरूम के भीतर सुनाई दी। इसके बाद उसने वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी दी।

बताया गया है कि डॉ. पाटिल के पास एक इंजेक्शन लगाने में इस्तेमाल होने वाला चिकित्सा उपकरण मिला था। हालांकि, घटना से जुड़े सभी तथ्यों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी।

पहले भी कार्यभार को लेकर जताई थी चिंता

अस्पताल के एक वरिष्ठ डॉक्टर के अनुसार, डॉ. पाटिल ने पहले काम के अधिक दबाव को लेकर शिकायत की थी। हालांकि, अस्पताल प्रशासन का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में इस संबंध में कोई नई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई थी। अधिकारियों के मुताबिक, संबंधित यूनिट में काम का दबाव पहले की तुलना में कम हुआ था।

अस्पताल प्रशासन ने उनके परिवार को सूचना दे दी है। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद शव परिजनों को सौंपा जाएगा। अस्पताल को फिलहाल पुलिस की ओर से किसी सुसाइड नोट की बरामदगी के संबंध में आधिकारिक जानकारी नहीं मिली थी।

रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटों पर फिर बहस

इस घटना के बाद रेजिडेंट डॉक्टरों के काम के घंटों, अत्यधिक कार्यभार और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सवाल फिर चर्चा में आ गए हैं। खबर में उद्धृत जानकारी के अनुसार, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के नियमों में रेजिडेंट डॉक्टरों के साप्ताहिक कार्य समय को 48 घंटे तक सीमित रखने का प्रावधान बताया गया है। हालांकि, अस्पतालों में वास्तविक कामकाज के दौरान इन सीमाओं का पालन कितना होता है, यह एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है।

रिपोर्ट में नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज के पुराने आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें एक प्रशिक्षु डॉक्टर के एक महीने में 540 घंटे से अधिक काम करने की बात सामने आई थी। वहीं, पिछले कुछ वर्षों में कम से कम 25 रेजिडेंट डॉक्टरों की आत्महत्या से मौत होने का भी उल्लेख किया गया है।

डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी

डॉ. शिवशरण पाटिल की मौत चिकित्सा संस्थानों में काम करने वाले युवा डॉक्टरों की परिस्थितियों और उनकी मानसिक सेहत पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत को सामने लाती है। लंबे काम के घंटे, नींद की कमी, मरीजों की जिम्मेदारी और लगातार काम का दबाव डॉक्टरों के स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं।

हालांकि, इस मामले में कार्यभार को लेकर पहले की गई शिकायतों के बावजूद, मौत का कारण केवल काम का दबाव था—ऐसा निष्कर्ष जांच पूरी होने से पहले निकालना उचित नहीं होगा। घटना के कारणों और परिस्थितियों की स्पष्ट जानकारी जांच के बाद ही सामने आ सकेगी।

 

Undercover Editor

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